Friday, 15 July 2016

मेरी दिनचर्या

मुझे पता है यह जीवन अनमोल है
लेकिन मामला बडा ही घोलमोल है 
बैठे जो नांव में पार करने को दरिया 
पर ये रास्ता भी कैसा जिसका न कोई छोर है |

सुबह उठते ही मुझको, घेर लेते है ये फेसबुक, वाट्स एप्प और अख़बार
सेहत को अपनी कर दिया है दरकिनार 
फिर होती है मुझको ऑफिस आने की जल्दी
माँ कहती है बेटा तू फिक्र न कर, मैंने रोटी है पैक करदी |
मै लापरवाही का मारा, कभी भूलता कुछ - कभी भूलता कुछ 
वक्त पे है पहुँचना मगर मुझको सच-मुच |

आता हूँ ऑफिस तेज गाडी चलाकर - 2
पर मेरे उत्साह की गति मेरी गाडी से भी ज्यादा है 
सच कहूँ तो जिंदगी जीने में बड़ा मजा आता है |

ऑफिस है अपना सबसे अच्छा,
रहता है सबके मन में एक छोटा सा बच्चा |
करते है यहाँ सब मिल बैठ के मस्ती
पर हालत है सबकी जैसे अपनी सी खस्ती |
कभी मजाक, कभी सुस्त हो जाते हो
ऑफिस में रहना यारों तुम ही तो सिखाते हो |

हो जाती है शाम तो घर लौट आता हूँ मैं
कभी सीधे दोस्तों के कभी घर जाता हूँ मैं|
सोने से पहले मन करता है कुछ पढ़ लूँ
अपने अन्दर ज्ञान थोडा सा और भर लूँ

पर अपनी नींद के आगे हार जाता हूँ मैं
और वही सपनों की रंगीन दुनियाँ में खो जाता हूँ मैं ||

बस इतनी सी देखों अपनी कहानी है |
एक दिन यारों यह भी मिट जानी है |
कोई गलती मुझसे अगर हो गयी हो तो माफ़ करना |
फिर पता नहीं भाई हमें कब मिलना ||
फिर पता नहीं भाई हमें कब मिलना ||



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