Friday, 21 April 2017

तुमसे मुलाकात

आज तुमसे मुलाकात हुई,
इस बार तुम सुबह मेरे उठते ही चली आई,
पर तुम आई बड़े लंबे अरसे बाद,
तुम्हारा अचानक से ऐसे चले आना डरा ही देता है मुझे,
खैर, मिलने तो मैं भी आया तुमसे,
वहीं मेरी पसंदीदा जगह पर।

इस बार हमारे बीच कोई नहीं था,
सिर्फ थे तो मैं और तुम,
तुम पूरी तरह भावों से भरी हो,
तुम जब भी मिलती हो गहरा एहसास कराती हो,
हिला देती हो अंदर तक,
आँखे भी नम होने से रुक नहीं पाती,
तुमने मुझ मस्ती में झूमते,
हवा में अपने सपनों के महलों से जमीन पर ला दिया है।

पर तुम सत्य हो,
तुम ही प्रथम हो,
मैं ही तुम्हें हमेशा नकारता रहा हूँ,
तुम ही जीवन हो,
तुम्हारा बिना तो जीवन ऐसा है मानों बगियाँ में केवल एक ही तरह के पुष्प,
तुम ही रंग हो,
तुम ही रस हो,
तुम ऊर्जा स्त्रोत हो,
तुम विश्वास बढाती हो,
तुम ही सफलता का मार्ग बतलाती हो।
तुमसे दोस्ती हो तो जीवन की यह कठिन राह भी आसान है,

पर सुनो, तुम रोज न आना,
बस अपना अहसास बनाये रखना,
रोजाना तुम्हारी उपस्थिति का तेज मैं सह नहीं पाऊँगा,
तुम आते रहना, मिलते रहना,
मेरा हाल चाल पूछते रहना,
बस कभी मेरे सपनों और मेरे बीच अवरोध न बनना,
भले ताउम्र मेरे साथ चलना,
और अब तो तुमसे दोस्ती भी हो गई है।

'प्रिय चिंता' तुमसे फिर मिलेंगे।

- कुमार यश

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