Tuesday, 22 October 2013

जाने कहाँ गए वो दिन? पार्ट : 1

मेरी मेट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद जब मेरे सभी दोस्त साइंस-मैथ में अपना भविष्य देख रहे थे, तभी ही हमने भी इंजीनियरिंग क्षेत्र में जाने का निर्णय लिया और बहुत ही आसानी से मेरा दाखिला राजकीय पोलिटेकनिक महाविद्यालय अलवर में हो गया जहाँ से मैने अपना यांत्रिकी अभियांत्रिकी (मैकेनिकल) में अपना डिप्लोमा पूरा किया |सभी बहुत खुश थे और होते भी क्यों न, आखिर बचपन से मेरा भी सपना एक इंजिनियर बनने का था|

मुझे याद है मेरे कॉलेज का वो पहला दिन और याद रहता भी क्यों न इसी दिन से बड़े बड़े मुंगेरी लाल जैसे सपने जो देखने जो शुरू कर दिए थे | मै मेरी २२ इंच की हीरो की साइकिल पर मेरे स्कूल के समय से ही दोस्त रहे हितेश चंदनानी के साथ कॉलेज गया | हम सभी को एक बड़े से हॉल मैं बैठा कर अनुमानित भाषणबजी का दौर चला और उसके बाद हमें कॉलेज से परिचित करवाया गया, अब तो कॉलेज की प्रयोगशालाओ को देख देख मन और अधिक उत्साहित होता जा रहा था, और हमारे कॉलेज के कुछ पुराने लड़के तभी से लडकियों को अपना भविष्य चुनने में लग गए थे |

खैर अगले दिन से सभी विभागों के विद्यार्थियों को एक साथ बैठाया, ऐसा कुछ दिन लगातार चलता रहा और लेक्चरर तो न जाने केवल बारहवी बेस से विद्यार्थियों को ही पढ़ाते थे | मास्टर जी जो पढ़ाते थे वो तो खैर समझ से बाहर था किन्तु हमें तो उस पल का इंतज़ार रहता था जब क्लास में उपस्थिति के लिए एक पन्ना चलाया जाता था जो कि आगे से शुरू होकर पीछे की ओर आता था, और हमें आगे बैठी कुछ लडकियों के नाम मालूम हो जाते थे मालूम नहीं क्यों इतनी उत्सुकता थी उन लडकियों के नाम जानने की जबकि उनमे से मैं किसी को जानता भी तो नहीं था |

कुछ दिन बीते कुछ नए दोस्त बने, अब तो कॉलेज की लडकियों के नए-नए किस्से भी सुनने को मिले, कुछ दोस्त उन्हें कुछ नामों के साथ छेड़ा भी करते थे हालाँकि वो हमें देखा भी नहीं करती थी | अब तो कॉलेज में लड़के लडकियों के ग्रुप भी बनने लगे थे, कुछ लड़के जो उन लडकियों के साथ रहा करते थे अब वो उन सबके दुश्मन हो गए थे जिनको की लडकियों से भाव मिलना भी मुश्किल होता था परिनामाश्वरूप उन्हें नित रोज उन अनैतिक लोगों से धमकियाँ मिलने लगी या यूँ कहें कि कुछ अपने चट्टे पट्टों के सामने अपमानित कर वो लोग अपने आप को महान सा महसूस करते थे न जाने क्या मिलता था उन्हें ऐसा करके ? शायद अपने मन को तसल्ली देते होगे |

अब हमारी दोस्ती उन लडको से हुई जो उस ग्रुप के सदस्य के थे आखिर हम भी तो यही चाहते थे कि हम भी किसी तरह इस ग्रुप के सदस्य हो जाये | अब धीरे धीरे हमारी मुलाकात भी लडकियों से होने लगी थी हम इन मुलाकातों का पूरा फायदा उठाते हुए अपना प्रभाव छोड़ने की कोशिश किया करते थे |

अब तो जिन्दगी में मानो नयी उमंग सी दौड़ पड़ी थी हम ऐसा कोई काम नहीं छोड़ते थे जिसमे की हमें अपना प्रभाव छोड़ने का मोका मिले, मेरे लिए तो यह सब बहुत ही मनोरंजक था | दरअसल इस कहानी की शुरुवात ही यही से होती है तो जरूर पढियेगा आगे क्या-क्या हुआ इस यात्रा में....?

इस कहानी का अगला अध्याय:- जाने कहाँ गए वो दिन? पार्ट : २ बहुत ही जल्द ही आपके सामने होगा |

आपका
यश अरोड़ा 

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