Thursday, 24 October 2013

जाने कहाँ गए वो दिन? पार्ट : 2

नमस्कार मित्रों आज फिर समय मिला अपना अनुभव लिखने का तो फिर से लिखना शुरू कर रहा हूँ उम्मीद करता हूँ की आपको मेरा पिछला ब्लॉग : जाने कहाँ गए वो दिन? पार्ट : १ पसंद आया होगा |


अब तो मेरी हरकतों की वजह से मै भी इस ग्रुप में अपना स्थान बना चुका था, और इस स्थान में मेरा साथ दे रहा था MTS का फ्री सेवा वाला फोन, आपको याद तो है न MTS ? बस फिर क्या था हम लोगो में से करीब ५ लोगो के पास MTS फ्री सेवा फोन और दिन भर फ्री बाते करना और करवाना मेरा मतलब अगर किसी का फ्री नहीं है तो उसे कांफ्रेंस पर दे देदा | मै एक बात तो बताना भूल ही गया उस समय हम ४ लड़के एक साथ रहा करते थे मै और हितेश तो अलवर के ही रहने वाले थे तो हमारा घर यही था और बाकि २ निशांत और सौरव भरतपुर और धोलपुर के रहने वाले थे वो दोनों रूम पार्टनर थे जबकि मै और हितेश जबरन उनके गैर रूम पार्टनर रहते हुए उनके रूम पर रहा करते थे | एक साथ वही खाना रात को वही रुकना, अगर रत को १ बजे भी ठंडा पानी पीने का मन किया तो चारों को इकठ्ठा होकर रूम से दूर वाटर कूलर से पानी भरकर लाना,  फुल नाईट गॉसिप... वाह क्या कमाल के दिन थे वो | खैर जिस तरह हमारा एक ग्रुप था उसी तरह इस ग्रुप की ४ लडकिय भी एक साथ पेइंग गेस्ट बनकर एक मकान मे रहा करती थी वो भी कुछ कम नहीं थी, मस्ती करने मे एकदम माहिर, उनका नाम पूजा, कृति, ज्योत्सना और उमा था | इधर हम चार लोग मोबाइल पर उधर वो चारों, हम अपने आप को SHYN ग्रुप कहते थे और उन्हें PJUK जो की हमारे नामों के प्रथम अक्षरों से मिलकर बनता था |

हम अपने उस रूम में खूब मस्तियाँ किया करते थे उदाहरण के तौर पर मै आपको बताता हूँ एक बार रात को 11 बजे चाय पीने का मन हुआ और देखा तो बर्तन धोने के लिए पानी नहीं भरा हुआ था चुकिं बर्तन छुठे थे तो धोना भी जरुरी था तो फिर सौरव के माइंड में आईडिया आया कि क्यों न इस कूलर में साफ़ कर लिया जाये और और हमने कूलर में साफ़ कर लिए, ऐसे ही छोटे- छोटे और भी कुछ पल थे, जो आज भी याद आते हैं और हम अंतिम में यह कहकर सबकुछ छोड़ देते कि कोई नहीं यार स्टूडेंट लाइफ में सब चलता है..|

अब वापिस आते है कॉलेज मे, फ्रेशेर पार्टी का दौर शुरू हुआ (हमारे कॉलेज मे अलग-अलग विभाग की अलग -अलग पार्टिया हुआ करती थी), सबसे पहले सिविल फिर इलेक्ट्रिकल और इसके बाद हमारी यानि मैकेनिकल डिपार्टमेंट की फ्रेशेर पार्टी | सिविल में संदीप और निशा खंडेलवाल मिस्टर और मिस फ्रेशेर बने | ये भी बाद मे हमारे दोस्त हो गए और सौभाग्य से मैकेनिकल में मै मिस्टर फ्रेशेर और ज्योत्सना मिस फ्रेशेर बनी | मै अपना सोभाग्य इसलिए मानता हूँ कि कोई भी मैकेनिकल वाला डांस वनके करने के लिए जल्दी से तैयार नहीं होता था और होता भी केसे सभी पढ़े-लिखे टोपर व्यक्ति और मुझे जबरदस्ती स्टेज पर चढ़ा दिया तो मैने भी एक पंजाबी गाना लगवा कर मेरे गिनती के ४ स्टेप्स को बार बार दोहरा दिया अब चुकी मै अकेला डांस करने वाला था तो मुझे ही मिस्टर बना दिया | कॉलेज में ऐसा होता है जो भी ये मिस्टर और मिस बनता है उसे पूरा कॉलेज जानने लग जाता है तो और दिखने में तो उस टाइम में ठीक ही था और बोलने मे भी निपुण, तो जब भी कोई भी मेरी बात हमारे उस ग्रुप में जुड़ने से पहले कोई करता तो हर कोई चाहता कि यार पता तो लगे की ये यश है कौन? और इस इफ़ेक्ट ने भी मेरा थोडा साथ दिया और लडकिया भी थोडा बात वगैरह करने लगी |

एक दिन कृति के MTS मोबाइल पर किसी व्यक्ति का कॉल आया और जबरदस्ती परेशान करने लगा आप समझ ही रहे होगे की कोई अनजान किसी लड़की को क्यों कॉल करेगा? शायद उसने कई बार कृति को कॉल किया हो... उसकी ड्राइंग की क्लास थी हम भी वही से गुजर रहे थे, हितेश मेरे पास आया और बोला की कोई कृति को परेशान कर रहा है तू जरा बात तो कर, शायद हितेश ने भी उसे गालिया दी हो.. मेरे साथ दीपक कक्कड़ था मेरा अच्छा मित्र है, मैने उससे कहा कि कक्कड़ क्या तुझे गाली देनी आती है? उसने कहा हाँ, तो मेने उसे कृति का मोबाइल पकड़ा दिया अब क्यों कि मेरा और कृति का मोबाइल एक जैसा था तो कक्कड़ को भी लगा की मेरा ही फोन होगा और वो शुरू हो गया गालियाँ देने में | मुझे नहीं पता दूसरी तरफ से वो लड़का उसे क्या बोल रहा था लेकिन बात ख़त्म होने के कई समय बाद मुझसे कक्कड़ बोल की ये मामला शांत नहीं हुआ है जरुर कुछ गलत होगा | और कॉलेज ख़त्म होने के बाद जैसा कक्कड़ का अनुमान था कॉलेज के गेट के बाहर भीड़ जमा थी और जैसे ही मै पंहुचा तो कक्कड़ में झमझम थप्पड़ों की बारिस चल रही थी मैने भी सोच लिया था कि मै भी कहा बचने वाला हूँ मेरे दोस्त मुझे दुसरे रास्ते से जाने को बोल रहे थे लेकिन अब देर हो चुकी थी, मैने हितेश को तो जल्दी से जाने को बोला और दो थप्पड़ मुझे भी पड़े, अब तो हम पूरे कॉलेज के चर्चा का विषय बन चुके थे मैकेनिकल के स्टूडेंट्स को तो विश्वास भी नहीं था की कक्कड़ उस लड़की की वजह से पिटा हैं जिससे की उसने आजतक बात भी नहीं की हैं, पता नहीं उस दिन मेरा उस ड्राइंग हॉल के बाहर से जाने का निर्णय सही था या गलत क्योकि उस दिन के बाद मै कृति के करीब हो गया था उस दिन घर पहुचने के बाद उससे मेरी कई बार बात हुई, वो बार बार माफ़ी मांग रही थी शायद उसे ठीक नहीं लग रहा होगा कि उसकी वजह से हम लोगो ने मार खायी |

अब तो रोजाना हम लोगो में बाते होने लगी पहले कुछ मिनट्स की बात होती थी फिर धीरे धीरे कुछ घंटों में होती चली गयी | हम लगभग घर-परिवार, दोस्ती, लाइफ स्टाइल हर विषय पर बाते करते थे पर सामने कम ही बाते करते थे, वो बहुत ही विनम्र स्वाभाव की लड़की थी मुझे उससे बाते करना बहुत अच्छा लगता था और शायद उसे भी | हम सन्डे को भी कॉलेज आने लगे युहि बस टाइम पास करने | एक दिन की बात है मकर सक्रांति का दिन था हमने कॉलेज में पिट्ठू खेलने का मन बनाया | खेल खेल में मेरा फ़ोन जो की कृति के फोन के जैसा था खो गया और हम सब उसे मिलकर तलाशने लगे लेकिन कही भी मोबाइल नहीं मिला, उसी दिन हमारे कॉलेज के मंदिर मे एक भंडारा था हम लोग मंदिर में जाकर भगवन से प्रार्थना करने लगे कृति भी भगवन को प्रे करने लगी कि यश का फोन ऐसा था (अपना फ़ोन दिखाते हुए) आप जल्दी से उसे धुन्दवा दो और हम सब भंडारा खाने के लिए बैठ गए, मेरी तो भूख पहले ही उडी हुई थी मुझसे कहा कुछ खाया जाना था, जो भी थोडा बहुत खाकर मै खड़ा हो गया और अपने भाई को फोन पर मेरे फोन के खोने की सूचना दी | मुझे डर था कि वो मुझे डांट लगाएगा लेकिन उन्होंने मुझसे मेरी सोच के विपरीत मुझे संतोष दिया और मुझे समझाया कोई नहीं खो गया तो नया आ जाएगा, खैर हस्ते खेलते हम अपने घरो को लौट आये | मै और हितेश शाम को घूम रह थे तो एक लड़का गगन मित्तल जो कि मेरे ही कॉलेज का था, मेरे पास आकर बोलता है कि तेरा फोन खो गया न मेने कहा- हाँ, वो बोला- तुझे मिल गया ? मुझे पहले ही गुस्सा आ रहा था तो मेने सीधा जवाब न देते हुए न कह दिया फिर उसने जेब से मेरा फोन निकलते हुए कहा - ये ले तेरा फोन | यकीं मानिये मै इतना खुश हुआ जितना जिन्दगी मे कभी नहीं हुआ था लेकिन जब मैने देखा तो उसमे सिम नहीं थी मुझे बुरा तो लगा कि इसने मेरी सिम तोड़ दी लेकिन उससे ज्यादा ख़ुशी मुझे मेरे फोन मुझे वापिस मिलने की थी | मैने कृति को ये बात बताई वो भी बहुत खुश हुई ||

शायद मेरी इन बातों से मै आपको पका रहा हूँ लेकिन ये बाते मै आपको पकाने के लिय नहीं लिख रहा, ये तो मै अपने पुराने दिनों को याद करते हुए लिख रहा हूँ, अब आप चाहे इन्हें पसंद करे या न करे मुझे तो लिखनी ही है | उम्मीद है अगले अध्याय मे कहानी को ख़त्म कर ही दूगा, आखिर इतना भी किसी को पकाना ठीक नहीं |

आपका
यश अरोड़ा

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