Tuesday, 5 July 2016

अभी कुछ लिखने का मन है, पता नहीं मै क्या लिखूँगा |

अभी कुछ लिखने का मन है,
पता नहीं मै क्या लिखूँगा...
मॉडर्न ज़माना है पैन नहीं, लैपटॉप उठाया है
बैठा हूँ लिखने
पता नहीं मै क्या लिखूँगा |

जो मन में आ रहा है,
बस लिखे जा रहा हूँ..
अपनी मन की कथा में लिखे जा रहा हूँ,
लेकिन आगे पता नहीं मै क्या लिखूँगा |

तेरी-मेरी कहानी लिखूँगा,
तन-मन की अपनी तन्हाई लिखूँगा,
तेरी निभाई बेवफाई लिखूँगा,
जरुर अपनी सच्चाई लिखूँगा..
पर पता नहीं मै क्या लिखूँगा...

खुद से खुद की लड़ाई लिखूँगा,
हुजूरों का मुझ पर अत्याचार लिखूँगा,
जीवन का अधुरा संघर्ष लिखूँगा,
मेरे सपनों की सच्चाई अब मै लिखूँगा..
पर पता नहीं मै क्या लिखूँगा |

वादा खिलाफी को मै लिखूँगा,
जुमले सुनाये वो मै लिखूँगा,
तेरे भाषणों की सच्चाई लिखूँगा,
मन के गुस्से को मै अब लिखूँगा..
पता नहीं मै क्या लिखूँगा |

लिखते-लिखाते कविता बन गयी है,
मेरे मन को भी तसल्ली मिल गयी है
पढना हो तुम को, तो तुम भी पढ़ लेना
पर पता नहीं मैने क्या लिखा है ||


ऐसे ही... रात के 10:30 बजे |
मेरे मन से |

आपका
यश अरोड़ा |



4 comments:

  1. हा हा हा .....मन की बात !

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  2. very very nice
    बस इतना ही लिख सकता हू बाकी पता नहीं क्या लिखूं

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